तू ना दूर है मझसे, ना मैं तुझसे दूर हुँ।
बस तू नही आती नजर, शायद ये मेरी नजर का कसूर है।।
न मैं तुझसे दूर हु न तू मझसे दूर है।
पर नजर तू नही आती, शायद ये भी मेरी नजर का कुसूर है।।
न ही तो वो अजनबी था, ओर न ही कोई चश्म ए फ़रोश।।
दास्तान के दिल क्या बयान कर दिया, समझो दिल ने कोई गुनाह कर दिया।।
सितारे ए आफताब बुलंदियों पर है तुम्हारे,
जो तुम भी आज कल किस्से कहानियों में आने लगे।।
वक़्त ने छीन लिया हमसे जिसको हम अपना समझा करते थे,
चिराग जो हाथो में लेकर रोज घिसा करते थे,
ये ना मालूम था सपने में थे हम,
हम तो बस उसकी खुशी की दुआ करते थे।।
पर दर्द ए तन्हाई ने जीना सिखा दिया,
चश्म के फ़रोश को अपना साथी बना लिया,
अब भी कहते हैं खुद से तेरी खैर।
तेरे ख्वाबो को मैने अपना सुरूर बना लिया।।
तू ही सहर , ओर तू ही शबनम,
तू ही खुशी थी, तू ही मेरा गम,
बात न फूलो की थी न कांटो की,
बात उस मुस्कुराहट की थी,
जिसके लिए मैं जिया करता था,
कसूर वक़्त का था या मेरा ये तो नही जानता,
बस इतना जानता हु की आज भी उसी खुशी, उसी मुस्कुराहट के लिए सब कुछ फिर से छोड़ सकता हु।।
वही शैतानियां,
वही बचकानी हरकतें,
वही इशारे,
वही रुसवाईयाँ,
वही हसी,
वही खुशी,
वही सब फिर से वापस चाहता हु।
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