कभी हसते हुए तो कभी रोते हुए देखा है।।
मैंने तेरी आँखों में नीले अम्बर को देखा है।।
उन्ही आँखों में गहरे समंदर को देखा है।।
तेरी आँखों के समंदर में अरमानो की
कश्ती को देखा है।
फिर उस कश्ती को कभी तैरते तो कभी
डुबते देखा है।।
तेरी प्यारी सी आँखों में सूरज की किरणों को देखा है।
फिर तेरी पलकों के साये में उसी सूरज को छिपते देखा है।।
तेरी आँखों में शाम को ढलते हुए देखा है।
उसी मधुर शाम को अमावस की काली रात होते हुए देखा है।।
उस रात में बिखरे गहरे सन्नाटे को देखा है।
कभी सहमे हुए तो कभी बेख़ौफ़ देखा है।।
कभी रुसवाई को देखा है। तो कभी तन्हाई को देखा है।।
कभी मुद्दत को देखा है तो कभी शीद्दत को देखा है।।
तेरी आँखों की मासूम फुलवारी को देखा है।।
कभी खिलते देखा है तो कभी मुरझाते हुए
देखा है।
तेरी आँखों में उस चिंगारी को देखा है।
तो अगले ही पल उस चिंगारी को शमा होते हुए भी देखा है।।
तेरी आँखों को घंने बादलो के साये में देखा है।।
कभी उन्हें बरसते हुए देखा है तो कभी पिघलते हुए देखा है।।
तेरी काली आँखों से टूटते हुए तारों को देखा है।
उन्ही टूटे तारों को जुगनुओ की तरह चमकते हुए देखा है।।
मैंने तेरी प्यारी सी आँखों में चाँद को कैद होते हुए देखा है।
फिर उसी चाँद को तेरी जुल्फों के साये में सिमटते हुए देखा है।।
मैंने कभी तेरी आँखों को तेरी जुल्फ़ो के साथ लुका छिपी खेलते हुए देखा है।।
तो कभी तेरी आँखों के तेरी पलकों के साथ आंख मिचोली खेलते हुए देखा है।।
मैंने तेरी आँखों में मौसमो को बदलते हुए देखा है।।
सावन भादो होते हुए तो कभी वीरान बंजर होते हुए देखा है।।
कभी मस्ती में मटकते हुए तो कभी बेचैनी में भटकते हुए, कभी तन्हाई में तड़पते हुए, तो कभी शान से सुलघते हुए देखा है।।
मैंने तेरी आँखों को सुबह से शाम और शाम से सुबह होते हुए देखा है।
कभी हसते हुए तो कभी रोते हुए देखा है।।
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