एक दुआ लेकर परिक्रमा गोवर्धन की करके,
मथुरा के मंदिरों में बचपन में जब गया था मैं,
महीनो से जो पैसे बचा लिए थे,
और ख़रीदे थे जो मैंने ,
जन्मभूमि वाले मंदिर से,
कंगन तुम्हारे लिए,
वो कान्हा तुम्हारे लिए
मुझे देख जो आज भी मुस्काते हैं,
तुमसे दूर पर तुम्हारी याद में
तुम्हे देख जो शरमाते हैं,
वो सूखे गुलाब के फूल,
वो भीगे सियाही वाले कागजी अल्फाज,
क्या आज भी तुमने संभाल रखे हैं?
आँसू की बारिश में भीगे ,
जिस तिल को मैंने सपनो में,
विदा-समय पर चूम लिया था,
कहा था मैंने मन मत हारना कभी,
तुम से हर सपना अपना है,
तुमको खो कर पर भी पाया है ,
चाहे मैं दुनिया भर में कहीं भी रहूं,
धरती अम्बर नीर या अग्नि हो जाऊं,
इस तिल को दर्पण में जब भी कभी देखो,
बस येही समझना ,
ठोड़ी पर यह तिल थोड़ी है ,
जग-भर की नज़रों से ओझल,
क्या समेट रखा है मोहब्बत को मेरी,
कुछ लम्हे तो हैं मेरे पास,
क्या कुछ तुम्हे संभाल के रखे है ?