जैसा दिखाई देने की करते हो कोशिशें,
मैं बखूबी जानता हु वैसे हो नहीं।
एक गहरा सा दर्द है किसी कोने में,
मुस्कुराते रहते हो, कहते हो नहीं,
मैं लाख कुरेदना चाहूं फिर भी छिपा ही लेते हो,
अपनी रूह तक पहुंचने देते हो नहीं,
मैं थक जाता हु किस्से कहानी सुनते सुनाते,
अपनी दास्तां ए दर्द को लफ्ज़ देते हो नहीं,
मुझे मालूम है कि मेरी बातें चुभ जाती होंगी तुम्हे,
दर्द को बयान करते हो नहीं,
कभी तो कहो वो दर्द e तन्हाई मुझसे,
मैं बखूबी जानता हो तुम ऐसे हो नहीं।।
कभी लिख कर कभी पढ़ के सुना देता हु अपना रोना तुम्हे,
तुम अपना दुखड़ा कहते क्यों नहीं।
कब तक छिपाओगे इन आंसुओं को इस प्यारी सी मुस्कान के पीछे,
जितने कठोर दिखते हो वैसे हो नहीं।।
मुझसे बेहतर कौन ही जानता होगा तुम्हे,
ये जिम्मेदारियों का बोझ भारी है, बताते क्यों नहीं।।