Friday, 7 March 2025

Self Love

‘कैसी हो?, और बताओ, क्या करती हो आजकल?’ 
मैंने कहा आजकल मैं ख़ुद को समय देती हूँ, ख़ुद ही को प्यार करती हूँ; एक पसीनायी दुपहरी में मैंने घर में सबके बीच सेल्फ लव के बारे में बात की, 

कुछ लोगों को तो ये आसानी से समझ में नहीं आया, 
किसी ने मेरे वैवाहिक सम्बन्धों को कमज़ोर कहा,
तो किसी ने इसे मन की एक विकृति बतलाया,
अफ़सोस जाहिर किया उन पर जो मेरे साथ रहते हैं, 
किसी ने सुझाया उम्र का लिहाज़ करना,
तो कुछ ने औरत की मर्यादा का पाठ पढ़ाया, 
हमदर्दी दिखायी,
और मुझसे कहा, देखो तुमको थोड़ा तो बदलना चाहिए।

उन सब औरतों की फुसफुसाहट ने मुझे ये एहसास दिलाया कि, हमारी तो नींव ही ग़लत पड़ी। 
छुटपन में कहा गया, भाई बहन से प्यार करो, दादी,बाबा,चाचा,बुआ, दोस्त, पड़ोसी और तो और कामवाली से भी प्यार से बात करवाया। 
प्रकृति से,जीव जन्तुओं से, देश से ,नैतिकताओं से, प्यार का सबक घोंट कर पिलाया गया। 

और बड़े हो कर हमने भी खूब प्यार लुटाया ,ससुराल, मायके, रिश्तों में, किसी ने सराहा, तो किसी को रास ना आया। मैं अपने हिस्से के प्यार की खोज में मैं चलते-चलते इक दिन मुझे, खुद पर प्यार आया, मैंने अपनी ओर स्नेहिल हाथ बढ़ाया, मैंने सीखा ख़ुद को समय देना, और अपने जीवन में आगे बढ़ना। 

तमाम धारणाएँ धराशायी हुई, 
सबने समझाया, प्राथमिकताएँ और अनिवार्यतायें, 
फिर ना जाने क्यों किसी को मेरे खाने में स्वाद कम आने लगा, किसी को मेरे साथ सुकून कम मिलने लगा, कोई मेरे संग भय खाने लगा, सिखाया जाने लगा कि प्रेम बस अपनों से किया जाना चाहिए, स्वयं से नहीं। 

स्वीकार्य था सबको, 
मेरा दूसरों से प्रेम का अभिनय करना
लेकिन, 
अस्वीकार्य था सबको,
मेरा स्वयं से प्रेम करना ।

No comments:

Post a Comment